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अभ्यास प्रश्न उत्तर हिन्दी साहित्य भाग 2

 1. हिन्दी साहित्य के आरंभिक काल को आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने क्या कहा है ? A.आदि काल B.चारण काल C.वीरगाथा काल D.सिद्ध – सामंत काल Answer: वीरगाथा काल 2. वीरगाथा काल का कवि नहीं है ? A.चन्दबरदाई B.नामदेव C.जगनिक D.मधुकर Answer: नामदेव 3. वीरगाथा काल के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं – A.चन्दबरदाई B.जगनिक C.दलपति विजय D.विद्यापति Answer: चन्दबरदाई 4. पृथ्वीराज रासो के रचनाकार हैं – A.जयदेव B.चन्दबरदाई C.जगनिक D.विद्यापति Answer: चन्दबरदाई 5. कबीरदास की भाषा थी – A.ब्रज B.कन्नौजी C.सधुक्कड़ी D.खड़ी बोली Answer: सधुक्कड़ी 6. कटकटान कपि कुंजर भारी | दहुभुजदंड तमकि महिमारी || डोलत धरनि सभापद खसे| चले भाजि भय मारुत ग्रसे || प्रस्तुत पंकित्यों के रचयिता हैं – A.तुलसीदास B.जायसी C.देव D.नूर मोहम्मद Answer: तुलसीदास 7. नयन जो देखा कमल-सा निरमल नीर सरीर | हंसत जो देखा हंस भा दसन नगहीर || प्रस्तुत पंक्तियों के रचयिता हैं – A.तुलसीदास B.जयशंकर प्रसाद C.जायसी D.कबीरदास Answer: जायसी 8. शिवा बावनी’ के रचनाकार हैं – A.पद्माकर B.भूषण C.केशबदास D.जगनिक Answer: भूषण 9. नर की और नल की गति एके करि जोय | ज...

जैन साहित्य का प्रथम कवि स्वयंभू का जीवन परिचय

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स्वयंभू जैन परंपरा के पहले कवि हैं। इनका समूचा साहित्य उपलब्ध है। कला और भाव-संवेदना की दृष्टि से भी ये एक प्रौढ कवि सिद्ध हुए हैं।  स्वयंभू कर्नाटक के एक साहित्यिक घराने के पिता मारुत देव और माँ पद्मिनी की संतान थे। इस घराने में तीन पीढ़ियों से साहित्य-साधना की परंपरा चली आ रही थो। कवि स्वयंभू ने दो विवाह किये। (क) 'पउमचरिउ' के अयोध्याकांड और विद्याधर कांड के अंत में इन दोनों पत्नियों का उल्लेख किया है।  इनकी अभी तक कुल तीन रचनाएँ मिली हैं,  'पउमचरिउ',  'रिट्ठनेमि चरिउ'  ‘स्वयंभू छंद'।  'पउमचरिउ' में राम का चरित्र विस्तार से वर्णित है, जिसमें राम को अंत में मुनींद्र से उपदेश के बाद जैन आदर्शों के अनुकूल निर्वाण प्राप्त करते दिखाया गया है। यह ग्रंथ 5 कांड तथा 83 संधियों वाला विशाल महाकाव्य है,7 ओर सधिया जोडी गयी,पुत्र त्रिभुवन के द्वारा। (ख) रिट्ठनेमि चरिउ' में कृष्णकथा का वर्णन मिलता है। ‘स्वयंभू छंद’ में प्राकृत और अपभ्रंश छंदों पर विचार किया गया है। स्वयंभू को अपभ्रंश भाषा का ‘वाल्मीकि’ कहा जाता है डॉ रामकुमार वर्मा ने स्वयंभू को हिंदी का प्रथम...

मैथिली कवि विद्यापति का संक्षिप्त परिचय

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मैथिली कवि विद्यापति (Vidyapati), 1360-1460 ई. मिथिला के राजा कीर्तिसिंह और शिवसिंह के दरबारी कवि थे, """वे संस्कृत, अपभ्रंश और मैथिली भाषा के विद्वान् थे""। विद्यापति का जन्म –1360-1448 ई.(अनुमानित) जन्म स्थल – ग्राम विसपी, दरभंगा (बिहार) पिता – गणपति गुरु – पण्डित हरि मिश्र आश्रयदाता – तिरहुत के राजा गणेश्वर, कीर्तिसिंह एवं शिवसिंह उपाधियाँ – स्वयं को ’खेलन कवि’ कहा। अन्य – मैथिली कोकिल, अभिनव जयदेव, नवकवि शेखर कवि कष्ठहार, दशावधान, पंचानन। संस्कृत में इनकी रचनाएँ –  शैव सर्वस्वसार,  गंगावाक्यावली,  दुर्गाभक्तितरंगिणी,  भूपरिक्रमा,  दानवाक्यावली,  पुरुष परीक्षा,  लिखनावली,  विभागसार,  गयपत्तलक वर्णकृत्य.. अवहट्ठ में इनकी रचनाएँ –  कीर्तिलता (1403 ई.), कीर्तिपताका (1403 ई., अप्राप्य) मैथिली में इनकी रचनाएँ – पदावली ’’गोरक्ष विजय नाटक’’ एक अंक का नाटक जिसमें संवाद संस्कृत व प्राकृत में तथा गीत मैथिली भाषा में है। विद्यापति को अलग-अलग विद्वानों ने शृंगारी , भक्त या रहस्यवादी कवि माना है – विद्यापति मूलतः शृंगारी कवि है। शृंगारी – रामचंद्र...

अमीर ख़ुसरो जीवन परिचय।

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  अमीर ख़ुसरो   पूरा नाम-अबुल हसन यामीन-उद्दीन ख़ुसरो अन्य नाम अमीर सैफ़ुद्दीन ख़ुसरो जन्म 1253 ई. जन्म भूमि एटा, उत्तर प्रदेश मृत्यु 1325 ई. अभिभावक सैफ़ुद्दीन और दौलत नाज़ कर्म भूमि दिल्ली कर्म-क्षेत्र संगीतज्ञ, कवि मुख्य रचनाएँ मसनवी किरानुससादैन, मल्लोल अनवर, शिरीन ख़ुसरो, मजनू लैला, आईने-ए-सिकन्दरी, हश्त विहिश विषय गज़ल, ख़याल, कव्वाली, रुबाई भाषा ब्रज भाषा, हिन्दी, फ़ारसी विशेष योगदान मृदंग को काट कर तबला बनाया, सितार में सुधार किए अन्य जानकारी हज़रत निज़ाम-उद्-दीन औलिया के शिष्य रहे। अमीर ख़ुसरो का जन्म सन 1253 ई. में एटा (उत्तरप्रदेश) के पटियाली नामक क़स्बे में गंगा किनारे हुआ था। वे मध्य एशिया की लाचन जाति के तुर्क सैफ़ुद्दीन के पुत्र थे। लाचन जाति के तुर्क चंगेज़ ख़ाँ के आक्रमणों से पीड़ित होकर बलबन (1266-1286 ई.) के राज्यकाल में शरणार्थी के रूप में भारत आकर बसे थे। उन्होंने स्वयं कहा है-मैं हिन्दुस्तान की तूती हूँ। अगर तुम वास्तव में मुझसे जानना चाहते हो तो हिन्दवी में पूछो। मैं तुम्हें अनुपम बातें बता सकूँगाl ख़ुसरो को हिन्दी खड़ी बोली का पहला लोकप्रिय कवि मान...

बीसलदेव रासो

 बीसलदेव रासो पुरानी पश्चमी राजस्थानी की एक सुप्रसिद्ध रचना है। इसके रचनाकार नरपति नाल्ह हैं। इस रचना में उन्होंने कहीं पर स्वयं को "नरपति" कहा है और कहीं पर "नाल्ह"। सम्भव है कि नरपति उनकी उपाधि रही हो और "नाल्ह" उनका नाम हो। बीसलदेव रासो" की रचना चौदहवीं शती विक्रमी की मानी जाती है। बीसलदेव एक प्रतापशाली राजा एवं संस्कृत के अच्छे कवि थे। उन्होंने अपना ‘हरकेलिविजय’ नाटक शिलापट्टों पर खुदवाया तथा राजकवि सोमदेव ने ललित विग्रह नामक नाटक भी लिखा। बीसलदेव रासो के चार खण्ड है- (१) प्रथम खण्ड- मालवा के परमार भोज की पुत्री राजमती से शाकम्भरी-नरेश बीसलदेव (विग्रहराज) के विवाह का वर्णन, (२) द्वितीय खण्ड- बीसलदेव का राजमती से रूठकर उड़ीसा जाना, (३) तृतीय खण्ड खण्ड - राजमती का विरह-वर्णन (४) चतुर्थ - भोजराज द्वारा अपनी पुत्री को वापस ले आना; बीसलदेव को वहाँ से चित्तौड़ लाने का प्रसंग। लेकिन यहाँ ऐतिहासिक दृष्टि से असंगति दिखती है क्योंकि भोज एवं बीसलदेव में लगभग 100 वर्षों का अंतर है। बीसलदेव से सौ वर्ष पहले ही धार के प्रसिद्घ राजा भोज का देहांत हो गया था। बीसलद...

हिन्दी साहित्य का काल विभाजन भाग 1

 हिंदी साहित्य का काल विभाजन एवं नामकरण (Hindi Sahitya ka Kaal Vibhajan aur Naamkaran) सबसे पहली पद्धति ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ आयी थी। ’गार्सा-द-तासी’ –  इस ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ के पहले इतिहासकार  ’गार्सा-द-तासी’  थे। इनकी रचना- ’इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐन्दुई’  थी। इनकी ये रचना ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ पर आधारित थी। इन्होंने काल-विभाजन का कोई प्रयास ही नहीं किया। ’शिवसिंह सेंगर’ –  इस ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ के दूसरे इतिहासकार  ’शिवसिंह सेंगर’  थे। इनकी रचना- ’शिवसिंह सरोज’  थी। ये भी ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ पर आधारित थी। इन्होंने ने भी काल-विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया। कालानुक्रमी पद्धति’ दूसरी पद्धति ’कालानुक्रमी पद्धति’ आयी थी। ’जाॅर्ज ग्रियर्सन’ – ’कालानुक्रमी पद्धति’ जाॅर्ज ग्रियर्सन’ से शुरू हुई। जिसके पहले इतिहासकार ’जाॅर्ज ग्रियर्सन’ थे। जाॅर्ज ग्रियर्सन ने पहली बार काल विभाजन का प्रयास किया। इन्होंने अपनी पुस्तक ’द माॅडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान’ को ग्यारह अध्यायों में विभक्त किया। इनका प्रत्येक अध्याय एक कालखण्ड को व्यक्त क...

हिन्दी साहित्य का आदिकाल भाग 1

आदिकाल आदिकाल को वीरगाथाकाल के नाम से भी जाना जाता है। हिन्दी साहित्य के इतिहास का यह काल सन् 993 ई. से 1318 ई. (संवत् 1050 से 1375) तक जारी रहा। आदिकाल की विशेषताएँ। आदिकाल की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं– 1. वीर रस की प्रधानता।  2. युद्धों का सजीव चित्रण।  3. ऐतिहासिक घटनाओं का चित्रण। 4. श्रृंगार एवं अन्य रसों का समावेश। 5. प्राकृत, अपभ्रंश, डिंगल एवं पिंगल भाषा का प्रयोग।  6. आश्रयदाताओं की प्रशंसा एवं उनका गान। आदिकाल काल नाम डॉ॰ हजारी प्रसाद द्विवेदी से मिला है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने 'वीरगाथा काल' तथा विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे 'वीरकाल' नाम दिया है। इस काल के समय के आधार पर साहित्य का इतिहास लिखने वाले मिश्र बंधुओं ने इसका नाम आरंभिक काल किया और आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने 'बीजवपन काल'। डॉ॰ रामकुमार वर्मा ने इस काल की प्रमुख प्रवृत्तियों के आधार पर इसको चारण-काल कहा है और राहुल संकृत्यायन ने सिद्ध-सामन्त काल। इस समय का साहित्य मुख्यतः चार रूपों में मिलता है : चारण-साहित्य, सिद्ध-साहित्य तथा नाथ-साहित्य, जैन साहित्य, प्रकीर्णक साहित्य। #आदिका...

हिन्दी व्याकरण भाग 1

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आदिकाल भाग 1

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