जैन साहित्य का प्रथम कवि स्वयंभू का जीवन परिचय
स्वयंभू जैन परंपरा के पहले कवि हैं। इनका समूचा साहित्य उपलब्ध है। कला और भाव-संवेदना की दृष्टि से भी ये एक प्रौढ कवि सिद्ध हुए हैं।
स्वयंभू कर्नाटक के एक साहित्यिक घराने के पिता मारुत देव और माँ पद्मिनी की संतान थे। इस घराने में तीन पीढ़ियों से साहित्य-साधना की परंपरा चली आ रही थो। कवि स्वयंभू ने दो विवाह किये।
(क) 'पउमचरिउ' के अयोध्याकांड और विद्याधर कांड के अंत में इन दोनों पत्नियों का उल्लेख किया है।
इनकी अभी तक कुल तीन रचनाएँ मिली हैं,
'पउमचरिउ',
'रिट्ठनेमि चरिउ'
‘स्वयंभू छंद'।
'पउमचरिउ' में राम का चरित्र विस्तार से वर्णित है, जिसमें राम को अंत में मुनींद्र से उपदेश के बाद जैन आदर्शों के अनुकूल निर्वाण प्राप्त करते दिखाया गया है।
यह ग्रंथ 5 कांड तथा 83 संधियों वाला विशाल महाकाव्य है,7 ओर सधिया जोडी गयी,पुत्र त्रिभुवन के द्वारा।
(ख) रिट्ठनेमि चरिउ' में कृष्णकथा का वर्णन मिलता है।
‘स्वयंभू छंद’ में प्राकृत और अपभ्रंश छंदों पर विचार किया गया है।
स्वयंभू को अपभ्रंश भाषा का ‘वाल्मीकि’ कहा जाता है
डॉ रामकुमार वर्मा ने स्वयंभू को हिंदी का प्रथम कवि माना है।
स्वयम्भू ने अपनी भाषा को देसी भाषा कहां है।
स्वयम्भू ने चतुर्मुख को पद्धड़िया बंध का प्रवर्तक तथा श्रेष्ठ कवि कहा है
पद्धरी 16 मात्रा का मात्रिक छंद है। इस छंद के नाम पर इस पद्धति पर लिखे जाने वाले काव्यों को पद्धड़िया बंध कहा गया है।
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