मैथिली कवि विद्यापति का संक्षिप्त परिचय
मैथिली कवि विद्यापति (Vidyapati), 1360-1460 ई. मिथिला के राजा कीर्तिसिंह और शिवसिंह के दरबारी कवि थे,
"""वे संस्कृत, अपभ्रंश और मैथिली भाषा के विद्वान् थे""।
विद्यापति का जन्म –1360-1448 ई.(अनुमानित)
जन्म स्थल – ग्राम विसपी, दरभंगा (बिहार)
पिता – गणपति
गुरु – पण्डित हरि मिश्र
आश्रयदाता – तिरहुत के राजा गणेश्वर, कीर्तिसिंह एवं शिवसिंह
उपाधियाँ – स्वयं को ’खेलन कवि’ कहा। अन्य – मैथिली कोकिल, अभिनव जयदेव, नवकवि शेखर कवि कष्ठहार, दशावधान, पंचानन।
संस्कृत में इनकी रचनाएँ –
शैव सर्वस्वसार,
गंगावाक्यावली,
दुर्गाभक्तितरंगिणी,
भूपरिक्रमा,
दानवाक्यावली,
पुरुष परीक्षा,
लिखनावली,
विभागसार,
गयपत्तलक वर्णकृत्य..
अवहट्ठ में इनकी रचनाएँ –
कीर्तिलता (1403 ई.),
कीर्तिपताका (1403 ई., अप्राप्य)
मैथिली में इनकी रचनाएँ –
पदावली
’’गोरक्ष विजय नाटक’’ एक अंक का नाटक जिसमें संवाद संस्कृत व प्राकृत में तथा गीत मैथिली भाषा में है।
विद्यापति को अलग-अलग विद्वानों ने शृंगारी , भक्त या रहस्यवादी कवि माना है – विद्यापति मूलतः शृंगारी कवि है।
शृंगारी – रामचंद्र शुक्ल, हरप्रसाद शास्त्री, रामकुमार वर्मा, रामवृक्षबेनीपुरी, सुभद्रा झा
भक्त – बाबू ब्रजनंदन सहाय, श्यामसुंदर दास, हजारी प्रसाद द्विवेदी
रहस्यवादी – ग्रियर्सन, जनार्दन मिश्र, नागेन्द्रनाथ गुप्त
विद्यापति के बारे में –
मैथिली कवि विद्यापति ने हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम ’कृष्ण’ को काव्य का विषय बनाया।
हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन्हें ’शृंगार रस के सिद्ध वाक् कवि’ माना।
कीर्तिलता राजा कीर्तिसिंह का प्रशस्ति काव्य है जिसे हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ’भृंग भृंगीसंवाद’ कहा है।
बच्चन सिंह ने विद्यापति को ’जातीय कवि’ की संज्ञा दी।
निराला ने पदावली के शृंगारिक पदों की मादकता को ’नागिन की लहर’ कहा।
भगवान शिव की भक्ति में रचे गये वे पद जो नृत्य के साथ गाये जाते हैं, नचारी कहलाते हैं।
विद्यापति के बारे में प्रमुख कथन –
🔸 आचार्य रामचंद्र शुक्ल – ’’आध्यात्मिक रंग के चश्में आजकल बहुत सस्ते हो गये हैं, उन्हें चढ़ाकर जैसे कुछ लोगों ने ’गीत गोविन्द’ को आध्यात्मिक संकेत बताया है वैसे ही विद्यापति के इन पदों को भी।’’
🔹 आचार्य रामचंद्र शुक्ल – ’’जयदेव की दिव्य वाणी की स्निग्ध धारा जो कि काल की कठोरता में दब गयी थी, अवकाश पाते ही मिथिला की अमराइयों में प्रकट होकर विद्यापति के कोकिल कंठ से फूट पङी।’’
🔸 शान्तिस्वरूप गुप्त – ’’विद्यापति पदावली ने साहित्य के प्रांगण में जिस अभिनव बसंत की स्थापना की है, उसके सुख-सौरभ से आज भी पाठक मुग्ध है क्योंकि उनके गीतों में जो संगीत धारा प्रवाहित होती है वह अपनी लय सुर ताल से पाठक या श्रोता को गद्गद् कर देती है।’’
🔹 श्याम सुंदर दास – ’’हिन्दी में वैष्णव साहित्य के प्रथम कवि प्रसिद्ध मैथिली कोकिल विद्यापति हुए। उनकी रचनाएँ राधा और कृष्ण के पवित्र प्रेम से ओत-प्रोत हैं।’’
🔸 रामकुमार वर्मा – ’’राधा का प्रेम भौतिक और वासनामय प्रेम है। आनंद ही उसका उद्देश्य है और सौन्दर्य ही उसका कार्य कलाप।’’
विद्यापति की प्रमुख पंक्तियाँ –
’’देसिल बअना सब जन मिट्ठा। तें तैं सन जंपओ अवहट्ठा।।’’ – (कीर्तिलता)
जय जय भैरवि असुर भयाउनि, पसुपति भामिनि माया।
नंदक नंदन कदम्बक तरु तर, धिरे-धिरे मुरलि बजाव।
सहज सुन्दर गौर कलेवर पीन पयोधर सिरी।
खने-खने नयन कोन अनुसरई। खने-खने बसन धूलि तनु भरई।
पीन पयोधर इबरि गता। मेरु उपजल कनकलता।
जहाँ जहाँ पद जुग धरई। तहिं तहिं सरोरुह झरई।
नव बृंदावन नव नव तकगन, नव नव विकसित फूल।
सरस वसंत समय भल पाओलि, दखिन पवन बहु धीरे।
सखि हे, कि पूछसि अनुभव मोय।
सोइ पिरिति अनुराग बखानिअ, तिल-तिल नूतन होय।
सैसव जोवन दुहु मिलि गेल।
’’रज्ज लुद्ध असलान बुद्धि बिक्कम बले हारल।
पास बइसि बिसवासि राय गयनेसर मारल।।’’
’’मारत राय रणरोल पडु, मेइनि हा हा सद्द हुअ।
सुरराय नयर नरअर-रमणि बाम नयन पप्फुरिअ धुअ।।’’
’’कतहुँ तुरुक बरकर। बार जाए ते को
कवि निराला ने ’नागिन की लहर’ कहा है,
रामचन्द्र शुक्ल विद्यापति को कृष्ण भक्ति परम्परा में नहीं मानते, वे व्यंग्यपूर्वक कहते हैं –
कीर्तिलता के महत्वपूर्ण तथ्य:
1,हरप्रसाद शास्त्री ने नेपाल के राजकीय पुस्तकालय से ‘कीर्तिलता’ की खोज की थी।
2,आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ‘कीर्तिलता’ की भाषा को ‘पूर्वी अपभ्रंश’ या ‘टकसाली अपभ्रंश’ की संज्ञा दी है।
कीर्तिलता विद्यापति की ऐतिहासिक रचना है। इनके प्रिय कवि जयदेव और प्रिय ग्रंथ जयदेव का ‘गीत गोविंद’ था।
“माधव सुन-सुन वचन हमार।”
3,आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने कीर्तिलता को ‘भृंग-भृंगी संवाद’ माना है।
4,विद्यापति को आदिकाल और भक्तिकाल का ‘संधि कवि’ कहा जा सकता है।
5,कीर्तिलता में विद्यापति के आश्रयदाता राजाकीर्ति सिंह की वीरता और उदारता आदि गुणों का वर्णन मिलता है।
6,विद्यापति ने कीर्तिलता में स्वयं को राजा कीर्तिसिंह का ‘लेखन कवि’ बतलाया है।
7,डॉ हरप्रसाद शास्त्री ने विद्यापति को ‘पंचदेवोपासक’ माना है।
8,डॉ बच्चन सिंह के अनुसार विद्यापति को भक्तकवि कहना उतना ही मुश्किल है जितना खजुराहो के मंदिरों को आध्यात्मिक कहना।
9,विद्यापति को भक्त मानने वाले विद्वान हजारी प्रसाद द्विवेदी, चैतन्य महाप्रभु तथा श्यामसुंदर दास हैं।
10,आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विद्यापति को श्रृंगारी कवि मानते हुए पदावली संदर्भ में लिखा है-
“अध्यात्मिकता रंग के चश्मे आजकल बहुत सस्ते हो गए हैं।”
11,अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔंध’ ने उनके काव्य की प्रशंसा करते हुए कहा है की- “गीत गोविंद के रचनाकार जयदेव की मधुर पदावली पढ़कर जैसा अनुभव होता है, वैसा ही विद्यापति की पदावली पढ़कर।”
12,डॉ श्यामसुंदर दास के अनुसार हिन्दी के वैष्णव साहित्य के प्रथम कवि विद्यापति हैं। उनकी रचनाएँ राधा-कृष्ण के पवित्र प्रेम से ओतप्रोत हैं।
13,विद्यापति ने कीर्तिलता को कहाणी कहा है- “पुरुष कहाणी हौ कत्थौ जसु पत्थावौ पुत्तु।।”
14,कीर्तिलता ‘देसिल बयना’ (अवहट्ठा) में रचित है।
कीर्तिपताका:
1,इसमें कवि विद्यापती ने बड़े ही चतुरता से महाराजा शिवसिंह का यशोवर्णन किया है।
2,इस ग्रंथ की रचना दोहा और छन्द में है। कहीं-कहीं पर संस्कृत के श्लोकों का भी प्रयोग किया गया है।
3,कीर्तिपताका ग्रंथ की खण्डित प्रति ही उपलब्ध है, जिसमे बीच के 9 से 29 तक के पृष्ठ अप्राप्य है।
4,इस ग्रंथ के प्रारंभ में अर्धनारीश्वर, चंद्रचूड़ शिव और गणेश की वंदना है।
5,कीर्तिपताका ग्रंथ के 30 वें पृष्ठ से अंत तक शिवसिंह के युद्ध पराक्रम का वर्णन है।
6,डॉ वीरेंद्र श्रीवास्तव लिखते हैं कि- “अतः निर्विवाद रूप से पिछले अंश को विद्यापति-विरचित कीर्तिपताका कहा जा सकता है।”
पद संख्या: 1
नन्दक नन्दन कदम्बक तरु-तर धीरे-धीरे मुरली बजाव।
समय संकेत निकेतन बइसल, बेरि बेरि बोली पठाब।।
सामरि तोरा लागि, अनुखन विकल मुरारि।।
जमुनाक तिर उपवन उद्वेगल, फिरि फिरि ततहि निहारि।
गोरस बेचत अवइत जाइत, जनि जनि पुछ बनमारि
तो हे मतिमान, सुमति! मधुसुदन बचन सुनह किछु मोरा
भनइ विद्यापति सुन वरजौरित वन्दह नन्द-किसोरा ।।1।।
पद संख्या: 2
राधा की वंदना
देख-देख राधा रूप अपार।
अपुरूब के बिहि आनि मिला ओल, खिति-तल लावनि-सार।।
अंगहि अंग-अनंग मुरछायत, हेरए पडए अथीर।
मनमथ कोटि-मंथन करू जे जन, से हेरि महि-मधि गीर।।
कत कत लखिमी चरन-तल ने ओछाए, रंगिनी हेरि विभोरि।
करू अभिलाख मनहि पद पंकज, अहोनिसि कोर अगोरि ।।2।
पद संख्या: 3
वयः संधि
सैसव जौवन दुहु मिलि गेल स्त्रवन क दुहु लोचन लेल।
बचन क चातुरि लहु-लहु हांस, धरनिये चाँद कएल परगास।।
मुकुर लई अव करई सिंगार, सखि पूछइ कइसे सूरत-विहार।।
निरजन उजर हेरई कत बेरि, हसइ से ऊपन पयोधर हेरि।।
पहिल बदरि-सम पुन नवरंग, दिन-दिन अनंग अगोरल अंग।।
माधव पेखल अपुरूप बाला, सैसव जौवन दुहु एक भेल।
विद्यापति कह तुहु अंगे आनि दुहु एक जोग हक के कह संयानि।।3।।
पद संख्या: 4
पहिलें बदरि कुच पुन नवरंग, दिन दिन बाढए पिडए अनंग।।
से पुन भए गेल बीज कपोर, अब कुज बाढल सिरिफल जोर।।
माधव पेखल रमनि संधान, धाटहि भेटल करत सिनान।।
तनसुक सुबसन हिरदय लागि, जे पुरुष देखल तेकर भागि।।
उर हिल्लोलित चाँचर केस, चामर झाँपल कनल-महेस।।
भनई विद्यापति सुनह मुरारि सुपुरुख बिलसए से बरनारी।।4।।

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