हिन्दी साहित्य का काल विभाजन भाग 1

 हिंदी साहित्य का काल विभाजन एवं नामकरण (Hindi Sahitya ka Kaal Vibhajan aur Naamkaran)


सबसे पहली पद्धति ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ आयी थी।

’गार्सा-द-तासी’ – इस ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ के पहले इतिहासकार ’गार्सा-द-तासी’ थे। इनकी रचना-’इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐन्दुई’ थी। इनकी ये रचना ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ पर आधारित थी। इन्होंने काल-विभाजन का कोई प्रयास ही नहीं किया।

’शिवसिंह सेंगर’ – इस ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ के दूसरे इतिहासकार ’शिवसिंह सेंगर’ थे। इनकी रचना-’शिवसिंह सरोज’ थी। ये भी ’वर्णानुक्रमी पद्धति’ पर आधारित थी। इन्होंने ने भी काल-विभाजन का कोई प्रयास नहीं किया।

कालानुक्रमी पद्धति’

दूसरी पद्धति ’कालानुक्रमी पद्धति’ आयी थी।


’जाॅर्ज ग्रियर्सन’ – ’कालानुक्रमी पद्धति’ जाॅर्ज ग्रियर्सन’ से शुरू हुई। जिसके पहले इतिहासकार ’जाॅर्ज ग्रियर्सन’ थे। जाॅर्ज ग्रियर्सन ने पहली बार काल विभाजन का प्रयास किया। इन्होंने अपनी पुस्तक ’द माॅडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिन्दुस्तान’ को ग्यारह अध्यायों में विभक्त किया। इनका प्रत्येक अध्याय एक कालखण्ड को व्यक्त करता है।

1 काल विभाजन में वैज्ञानिकता का अभाव है।

2 अध्यायों की संख्या (11) या (12) अधिक होने से उसे काल विभाजन मानना उपयुक्त नहीं है।

मिश्रबन्धुओं का काल-विभाजन –

मिश्रबन्धु – मिश्रबन्धु की रचना ’मिश्रबन्धु-विनोद’ थी। इन्होंने ’काल’ को पाँच भागों में बांटा है-


(1) आरम्भिक काल – आरम्भिक काल को दो भागों में बांट दिया-

पूर्वारम्भिक काल (700-1343 विक्रमी.संवत्)

उत्तरारम्भिक काल (1344-1444 विक्रमी.संवत्)

(2) माध्यमिक काल – माध्यमिक काल को दो भागों में बांट दिया-

पूर्व माध्यमिक काल (1445-1560 विक्रमी संवत्)

प्रौढ़ माध्यमिक काल (1561-1680 विक्रमी संवत्)

(3) अलंकृत काल – अलंकृत काल को दो भागोें में बांट दिया –

पूर्वालंकृत काल (1681-1790 विक्रमी संवत्)

उत्तरालंकृत काल (1791-1889 विक्रमी संवत्)

4) परिवर्तन काल – (1890-1925 विक्रमी संवत्)

(5) वर्तमान काल – (1926 विक्रमी संवत् से आगे तक)

रामचन्द्र शुक्ल ने यह परिभाषा दी है-

 ’’सारे रचना काल को केवल आदि, मध्य, पूर्व, उत्तर इत्यादि खण्डों में आँख मूँदकर बाँट देना – यह भी न देखना कि किस खण्ड के भीतर क्या आता है और क्या नहीं – किसी वृत संग्रह को इतिहास नहीं बना सकता।’’

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने ’दोहरा नामकरण परम्परा’ की शुरूआत की।’काल-विभाजन’ को चार भागों में बांटा है-


(1) आदिकाल (वीरगाथा काल) – 1050 से 1375 वि.सं.

(2) पूर्वमध्य काल (भक्तिकाल) – 1375 से 1700 वि.सं.

(3) उत्तर मध्यकाल (रीतिकाल) – 1700 से 1900 वि.सं.

(4) आधुनिक काल (गद्य काल) – 1900 से 1984 वि.सं.

हजारीप्रसाद द्विवेदी’का कथन, 

’’रामचन्द्र शुक्ल ने जिन ग्रन्थों को आधार बनाकर ’काल-विभाजन’ किया है वह सारे ग्रन्थ ही आधारहीन है। इन ग्रन्थों का कोई इतिहास नहीं है।’’

डाॅ. रामकुमार वर्मा ने ’काल-विभाजन’ को पाँच भागों में बांटा है-

(1) संधिकाल – 750 से 1000 वि.सं.

(2) चारणकाल – 1000 से 1375 वि.सं.

(3) भक्तिकाल – 1375 से 1700 वि.सं.

(4) रीतिकाल – 1700 से 1900 वि.सं.

(5) आधुनिक काल – 1900 से अब तक


जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन

जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन इन की पुस्तक का नाम द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑव नार्दन हिंदुस्तान है। सच्चे अर्थों में हिंदी साहित्य का सर्वप्रथम इतिहास जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन द्वारा लिखा गया।


इस पुस्तक की रचना1888 ई.में की गई।

इन्होने कालक्रमानुसार लेखकों क़ो स्थान दिया ।

सर्वप्रथम काल विभाजन इन्होने किया व पूरे साहित्य क़ो 11 ya 12 खंडो मे बांटा।

आदिकाल क़ो चारण काल कहा।

चारण काल की शुरुआत 799ई. से मानी।

#शुक्ल ने इसे बड़ा कवि वृत संग्रह कहा है।


धन्यवाद 

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